मेरा नाम दानिश रेज़ा है! मै भाषा केन्द्र के जापानी सेन्टर
का छात्र हूँ! अभी मै जापानी भाषा के स्नातक के तृतीय
वर्ष का छात्र हूँ! जापानी भाषा एक कठिन भाषा है!
इस भाषा को काना और कांजी लिपि मे लिखा जाता है! कांजी
चिह्न है जो कि चीनी लिपि है जो जापानियो ने अपनी भाषा मे
मिलाई है! जापानी भाषा क्षेत्र मे नौकरी के बहुत अवसर
है! इस भाषा मे स्नातक के साथ-साथ शोध भी कर सकते है!
स्नातक से ही इसमे बहुत सारे छात्रवृति है जिसमे की छात्रो
को जापान जाकर अध्य्यन करने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है!
अतत: जापानी भाषा कठिन होने के साथ-साथ बहुत रूचिकर है!
Monday, December 1, 2008
एस.एल.
भाषा विघालय जवाहरलाल नेहरू विश्वविघालय के प्रमुख
स्कूलो मे से एक है! इसकी स्थापना सन १९८६ मे हुई थी! इसका
मुख्य उद्देश्य विदेशी भाषाओ के जरिए भारत की संस्कृति को
दूसरे देशो से आदान-प्रदान करना था! भाषा विघालय मे
जापानी, चीनी,रूसी, अरबी, पारसी, जैसी विदेशी भषाओ
का अध्य्यन होता है! इस विघालय मे लगभग १३०० छात्र-छात्राए
है! विदेशी भाषाओ के अलावा भारतीय भाषाओ का भी अध्य्यन
इस स्कूल मे होता है! वैसे तो जे.एन.यू. उच्च स्तर की पढाई के लिए
जाना जाता है पर भाषा विघालय मे स्नातक स्तर का भी अध्य्यन
होता है! पूरे साल मे एक बार हमारे विघालय का वार्षिक उत्सव
होता है जिसे कल्लोल कहते है! इसमे खेल-कूद , संस्कृत कार्यक्रम
और तरह-तरह के प्रोग्राम होते है! भाषा विघालय मे पढाई के
बाद बहुत ही आसानी से नौकरी मिल जाती है!
स्कूलो मे से एक है! इसकी स्थापना सन १९८६ मे हुई थी! इसका
मुख्य उद्देश्य विदेशी भाषाओ के जरिए भारत की संस्कृति को
दूसरे देशो से आदान-प्रदान करना था! भाषा विघालय मे
जापानी, चीनी,रूसी, अरबी, पारसी, जैसी विदेशी भषाओ
का अध्य्यन होता है! इस विघालय मे लगभग १३०० छात्र-छात्राए
है! विदेशी भाषाओ के अलावा भारतीय भाषाओ का भी अध्य्यन
इस स्कूल मे होता है! वैसे तो जे.एन.यू. उच्च स्तर की पढाई के लिए
जाना जाता है पर भाषा विघालय मे स्नातक स्तर का भी अध्य्यन
होता है! पूरे साल मे एक बार हमारे विघालय का वार्षिक उत्सव
होता है जिसे कल्लोल कहते है! इसमे खेल-कूद , संस्कृत कार्यक्रम
और तरह-तरह के प्रोग्राम होते है! भाषा विघालय मे पढाई के
बाद बहुत ही आसानी से नौकरी मिल जाती है!
होम टाउन
मेरा घर नेपाल के सीमा से सटे बिहार प्रान्त के प्रकृति की
गोद मे बसे एक छोटे और बहुत ही शांत कसबे मे है! इस कसबे
के ठीक बगल मे एक छिटी सी नदी बहती है! कसबे के सारे
बच्चे इस नदी मे नहाते है! हमारे कसबे मे एक अस्पताल,
राजकीय स्कूल, कॉलेज, आदि है! दूर तक चाय के खेत फ़ैले
हुए है जो कि प्राकृतिक को विहंगम बनाता है! हमारे कसबे
के अधिकतर लोग डाक्टर, इन्जीनीयर और शिक्षक है! यहा पास
मे एक बहुत ही बढा बाजार है जिसमे कि सारे सामान सरलता
से उपलब्ध है! अंत मे हमारा शहर बहुत ही खूबसूरत है
और मै इसकी प्रगति मे योगदान देना चाहता हूँ!
गोद मे बसे एक छोटे और बहुत ही शांत कसबे मे है! इस कसबे
के ठीक बगल मे एक छिटी सी नदी बहती है! कसबे के सारे
बच्चे इस नदी मे नहाते है! हमारे कसबे मे एक अस्पताल,
राजकीय स्कूल, कॉलेज, आदि है! दूर तक चाय के खेत फ़ैले
हुए है जो कि प्राकृतिक को विहंगम बनाता है! हमारे कसबे
के अधिकतर लोग डाक्टर, इन्जीनीयर और शिक्षक है! यहा पास
मे एक बहुत ही बढा बाजार है जिसमे कि सारे सामान सरलता
से उपलब्ध है! अंत मे हमारा शहर बहुत ही खूबसूरत है
और मै इसकी प्रगति मे योगदान देना चाहता हूँ!
सेन्टर
मै भाषा विघालय के जापानी भाषा केन्द्र का छात्र हूँ!
हमारे केन्द्र की स्थापना सन १९८६ मे हुई थी! हमारे केन्द्र
मे जापानी के साथ-साथ कोरियन भाषा का भी अध्य्यन होता
है! जापानी भाषा क केन्द्र मे भारतीय शिक्षको के अलावा
जापानी शिक्षक भी है! भाषा की पढाई के साथ-साथ
हम लोग जापान की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, भूगोल,
इतिहास को भी पढते है! जापानी भाषा मे चीनी लिपि
होने के कारण से बहुत ही मुश्किल भाषा बन जाती है!
लिखने के साथ-साथ हम लोग बात-चीत के लिए भी लैबोरेट्री
कक्षा मे भी पढाई करते है! साल मे एक बार जापान सरकार
के सहयोग से " बुनकासाई " नाम का प्रोग्राम होता है जिसमे
हम जापान के संस्कृति को नजदीकी से देख सकते है! जापानी
भाषा मे नौकरी के बहुत अवसर है!
हमारे केन्द्र की स्थापना सन १९८६ मे हुई थी! हमारे केन्द्र
मे जापानी के साथ-साथ कोरियन भाषा का भी अध्य्यन होता
है! जापानी भाषा क केन्द्र मे भारतीय शिक्षको के अलावा
जापानी शिक्षक भी है! भाषा की पढाई के साथ-साथ
हम लोग जापान की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, भूगोल,
इतिहास को भी पढते है! जापानी भाषा मे चीनी लिपि
होने के कारण से बहुत ही मुश्किल भाषा बन जाती है!
लिखने के साथ-साथ हम लोग बात-चीत के लिए भी लैबोरेट्री
कक्षा मे भी पढाई करते है! साल मे एक बार जापान सरकार
के सहयोग से " बुनकासाई " नाम का प्रोग्राम होता है जिसमे
हम जापान के संस्कृति को नजदीकी से देख सकते है! जापानी
भाषा मे नौकरी के बहुत अवसर है!
मेरी रूचिया
मेरा शौक फ़ुटबॉल खेलना है! मै बचपन से ही फ़ुटबॉल
खेलना मेरा शौक रहा है! बचपन से ही जब मै प्रथम
कक्षा मे था तब से ही मै फ़ुटबॉल खेलता आ रहा हूँ!
बचपन मे कई बार चोट लगने के बावजूद मै निरंतर फ़ुट्बॉल
खेलता रहा और अतत: मेरा चयन राजकीय स्तर पर हुआ!
फ़ुट्बॉल के अलावा मुझे सिनेमा मे भी शौक है! मै अक्सर नई
सिनेमा देखने जाता हूँ! नायक मे मुझे एरफ़ान खान, नाना
पाटेकर पसंद है! पसंदीदा सिनेमा की बात करे तो मुझे इकबाल
जैसे सिनेमा पसंद है और मै भविष्य मे भी कुछ सिनेमा बनाने
की सोच रहा हूँ!
खेलना मेरा शौक रहा है! बचपन से ही जब मै प्रथम
कक्षा मे था तब से ही मै फ़ुटबॉल खेलता आ रहा हूँ!
बचपन मे कई बार चोट लगने के बावजूद मै निरंतर फ़ुट्बॉल
खेलता रहा और अतत: मेरा चयन राजकीय स्तर पर हुआ!
फ़ुट्बॉल के अलावा मुझे सिनेमा मे भी शौक है! मै अक्सर नई
सिनेमा देखने जाता हूँ! नायक मे मुझे एरफ़ान खान, नाना
पाटेकर पसंद है! पसंदीदा सिनेमा की बात करे तो मुझे इकबाल
जैसे सिनेमा पसंद है और मै भविष्य मे भी कुछ सिनेमा बनाने
की सोच रहा हूँ!
Monday, November 24, 2008
पेट की खातिर
पेट की खातिर ज़्यादातर बिहारियों की तरह ही घर से दूर...... कामकाज जो मिला सो कर रहा हूँ... इस बीच देश और दुनिया के गोरे शहरों को घूम-फ़िर के समझने बुझने की पेंच में लगा हुआ हूँ... देश से बाहर हूँ तो वक्त थोड़ा ज्यादा बच जाता है ... कटाने दौड़ाने लगा तो... मैंने सोचा उसका भी थोड़ा कटा जाए जो हमारा कटते आए हैं... लिविंग-रूम,ड्राइंग-रूम में बैठ के बहुत लोगों को गरियाये... और गरियाते हुए सुने... अब ख़ुद कुछ दोस्तों के साथ कुछ करने की कोशिश जारी है.... पर ये है थोड़ा ही मुश्किल कम से कम गलियाने से ... :)
रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है
आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो. फिर जब तुम्हे खबर देंगे तो वहाँ जाकर ज्वायन कर लेना . पर धीरे - धीरेलोगो को पता लग गया कि फलाँ फार्म भरकर ढिकाँ जगह जमा कर देने भर से कुछ होना जाना नही है तो लोगो ने उस मन्दिर की राह जाकर सिर पटकना बन्द कर दिया.
बड़े बूढे कहते हैं पहले रोजगारदफ्तर वाले गली - गलीघूमते थेऔर ढूँढते रहते थे कि किसे रोजगार दिया जाये ? कोई जरा सा योग्य मानुस दिखा नहीं कि उसे पकड़ कर बिठा देते थे कि भैयायहाँनौकरी करनी पड़ेगीऔर आदमी मजबूरी मे काम करने लगता था. पर अब वो दिन हवा हुए और नौकरी देने वाले पकड़ पकड़ करलोगों को स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मना रहे हैं. और जो नहीं मान रहे उन्हें धक्के देकर बाहर कर रहे हैं. जो लोग कम्प्यूटर बाबा की लाठी टेकते हुए जर्मनी और अमेरीका एक्स्पोर्ट हो गये थे , वे भी वापस आकर देश मे चौथाई तनखाह पर रोजगार तलाश रहे हैं
देश के प्रधान मंत्री ने किसी दिन एक फाइव स्टार रिसोर्ट मे बैढकर चिंतन कियातो बेरोजगारी की हालतदेखकरवे द्रवित हो गये .जी मे तो आया कि फटाफ़ट पूर्व प्रधान मंत्रियों की तर्ज पर दो - चार कवितायें लिख डालें . पर कुछ सोच कर रह गये और सीधे यही घोषणाकर दी कि सरकार एक करोड़ लोगो को रोजगार देगी. बाद मे लोगो ने पूछा कि सरकार के उस वायदे का क्या हुआ? इस बात पर सरकार भन्ना गई. उसका भन्नाना भे स्वाभाविक है. अब अकेली सरकार क्या क्या करे बेचारी.
वह नदियों को आपस मे जोडे या लोगों को. वह समन्दर के अन्दर सेतु की रक्षा करे या अपनी. वह बैंकों की ब्याज दर घटाने मे समय लगाये या बेरोजगारी घटाये. वह अयोध्या मे मन्दिरबनाये. ये आपके भुक्खड पेट की आग बुझाये. वह करोड पति क्रिकेट खिलाडियों को टैक्स मे रियायत दे या पिद्दी जनता की कोटरो मे धंसी आँखे निहारे. अब समस्याओं पर समस्यायेंहै . पाकिस्तान है . कश्मीर है. बाँगला देशी है. नये राज्यो की डिमांड है.परमाणु समझौते हैं.
गजब के हो तुम भी. यहाँ हम कितनी बड़ी बड़ी समस्याओं से पंजा लडा रहे हैं और तुम हो कि आ गये कमीज ऊपर उठाये अपना पिचका पेट दिखाने. हम यहाँराज्यों की सरकारें गिराने - बनाने मे लगे हुए है और तुम आ गये मुँह उठाये कि खाना चाहिए.
वहाँ हम कुर्सी के इतनी बडी लड़ाई लड़ रहे हैं और एक तुमहो कि जिन्दगीकी जंग से ही नही निकल पा रहे हो.. लानत है तुम पर.वर्ल्ड वार के बजायघर वार की चिंता मे डूबउतरा रहे हो. तुम क्या अकेले हो,जो बेरोजगार हो? चीन अमेरीका , जापान कहाँनहीं है बेरोजगारी? लन्दन तक की हर दूसरी दुकान किरायेदार के लिए खाली पडी है मुँह बाये हुए.
अरे काम नही है तो काम ढूँढो. सरकार अगर लोगों को काम देने लगी तो खुद क्या काम करेगी? अरे जो वीर पुरूष हैं, उन्हे क्या काम की कमी है? लाख बेरोजगारी है पर करने वालों को काम की कमी है क्या?. आँखखोल कर देखो , पढे लिखे होने का इतना तो उपयोग करो. अनपढ किसानों तक को देखो, कुछ न कुछ करते ही रहते है. कपास गन्ना बोते है और उससे फुर्सतमिलती है तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के चक्कर लगातेहैं. इन सबसे समय़ मिलता है तो सल्फास वगैरह का स्वाद चखते है और आत्म हत्या भी करते रहते हैं.
जिनके दिल मे हिम्मत होती है, वे मन्दी का रोना नही रोते. अकल वाले कैसे भी पैसाबना लेते हैं. मुफत मे मिली किडनी भी हजारों मे सेल करते है. इसलिए बेरोजगारी का रोना मत रो प्यारे क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है. इसीलिए जोर से लगे रहो.
बड़े बूढे कहते हैं पहले रोजगारदफ्तर वाले गली - गलीघूमते थेऔर ढूँढते रहते थे कि किसे रोजगार दिया जाये ? कोई जरा सा योग्य मानुस दिखा नहीं कि उसे पकड़ कर बिठा देते थे कि भैयायहाँनौकरी करनी पड़ेगीऔर आदमी मजबूरी मे काम करने लगता था. पर अब वो दिन हवा हुए और नौकरी देने वाले पकड़ पकड़ करलोगों को स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मना रहे हैं. और जो नहीं मान रहे उन्हें धक्के देकर बाहर कर रहे हैं. जो लोग कम्प्यूटर बाबा की लाठी टेकते हुए जर्मनी और अमेरीका एक्स्पोर्ट हो गये थे , वे भी वापस आकर देश मे चौथाई तनखाह पर रोजगार तलाश रहे हैं
देश के प्रधान मंत्री ने किसी दिन एक फाइव स्टार रिसोर्ट मे बैढकर चिंतन कियातो बेरोजगारी की हालतदेखकरवे द्रवित हो गये .जी मे तो आया कि फटाफ़ट पूर्व प्रधान मंत्रियों की तर्ज पर दो - चार कवितायें लिख डालें . पर कुछ सोच कर रह गये और सीधे यही घोषणाकर दी कि सरकार एक करोड़ लोगो को रोजगार देगी. बाद मे लोगो ने पूछा कि सरकार के उस वायदे का क्या हुआ? इस बात पर सरकार भन्ना गई. उसका भन्नाना भे स्वाभाविक है. अब अकेली सरकार क्या क्या करे बेचारी.
वह नदियों को आपस मे जोडे या लोगों को. वह समन्दर के अन्दर सेतु की रक्षा करे या अपनी. वह बैंकों की ब्याज दर घटाने मे समय लगाये या बेरोजगारी घटाये. वह अयोध्या मे मन्दिरबनाये. ये आपके भुक्खड पेट की आग बुझाये. वह करोड पति क्रिकेट खिलाडियों को टैक्स मे रियायत दे या पिद्दी जनता की कोटरो मे धंसी आँखे निहारे. अब समस्याओं पर समस्यायेंहै . पाकिस्तान है . कश्मीर है. बाँगला देशी है. नये राज्यो की डिमांड है.परमाणु समझौते हैं.
गजब के हो तुम भी. यहाँ हम कितनी बड़ी बड़ी समस्याओं से पंजा लडा रहे हैं और तुम हो कि आ गये कमीज ऊपर उठाये अपना पिचका पेट दिखाने. हम यहाँराज्यों की सरकारें गिराने - बनाने मे लगे हुए है और तुम आ गये मुँह उठाये कि खाना चाहिए.
वहाँ हम कुर्सी के इतनी बडी लड़ाई लड़ रहे हैं और एक तुमहो कि जिन्दगीकी जंग से ही नही निकल पा रहे हो.. लानत है तुम पर.वर्ल्ड वार के बजायघर वार की चिंता मे डूबउतरा रहे हो. तुम क्या अकेले हो,जो बेरोजगार हो? चीन अमेरीका , जापान कहाँनहीं है बेरोजगारी? लन्दन तक की हर दूसरी दुकान किरायेदार के लिए खाली पडी है मुँह बाये हुए.
अरे काम नही है तो काम ढूँढो. सरकार अगर लोगों को काम देने लगी तो खुद क्या काम करेगी? अरे जो वीर पुरूष हैं, उन्हे क्या काम की कमी है? लाख बेरोजगारी है पर करने वालों को काम की कमी है क्या?. आँखखोल कर देखो , पढे लिखे होने का इतना तो उपयोग करो. अनपढ किसानों तक को देखो, कुछ न कुछ करते ही रहते है. कपास गन्ना बोते है और उससे फुर्सतमिलती है तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के चक्कर लगातेहैं. इन सबसे समय़ मिलता है तो सल्फास वगैरह का स्वाद चखते है और आत्म हत्या भी करते रहते हैं.
जिनके दिल मे हिम्मत होती है, वे मन्दी का रोना नही रोते. अकल वाले कैसे भी पैसाबना लेते हैं. मुफत मे मिली किडनी भी हजारों मे सेल करते है. इसलिए बेरोजगारी का रोना मत रो प्यारे क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है. इसीलिए जोर से लगे रहो.
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