Monday, December 1, 2008

स्वयं के बारे मे

मेरा नाम दानिश रेज़ा है! मै भाषा केन्द्र के जापानी सेन्टर
का छात्र हूँ! अभी मै जापानी भाषा के स्नातक के तृतीय
वर्ष का छात्र हूँ! जापानी भाषा एक कठिन भाषा है!
इस भाषा को काना और कांजी लिपि मे लिखा जाता है! कांजी
चिह्न है जो कि चीनी लिपि है जो जापानियो ने अपनी भाषा मे
मिलाई है! जापानी भाषा क्षेत्र मे नौकरी के बहुत अवसर
है! इस भाषा मे स्नातक के साथ-साथ शोध भी कर सकते है!
स्नातक से ही इसमे बहुत सारे छात्रवृति है जिसमे की छात्रो
को जापान जाकर अध्य्यन करने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है!
अतत: जापानी भाषा कठिन होने के साथ-साथ बहुत रूचिकर है!

एस.एल.

भाषा विघालय जवाहरलाल नेहरू विश्वविघालय के प्रमुख
स्कूलो मे से एक है! इसकी स्थापना सन १९८६ मे हुई थी! इसका
मुख्य उद्देश्य विदेशी भाषाओ के जरिए भारत की संस्कृति को
दूसरे देशो से आदान-प्रदान करना था! भाषा विघालय मे
जापानी, चीनी,रूसी, अरबी, पारसी, जैसी विदेशी भषाओ
का अध्य्यन होता है! इस विघालय मे लगभग १३०० छात्र-छात्राए
है! विदेशी भाषाओ के अलावा भारतीय भाषाओ का भी अध्य्यन
इस स्कूल मे होता है! वैसे तो जे.एन.यू. उच्च स्तर की पढाई के लिए
जाना जाता है पर भाषा विघालय मे स्नातक स्तर का भी अध्य्यन
होता है! पूरे साल मे एक बार हमारे विघालय का वार्षिक उत्सव
होता है जिसे कल्लोल कहते है! इसमे खेल-कूद , संस्कृत कार्यक्रम
और तरह-तरह के प्रोग्राम होते है! भाषा विघालय मे पढाई के
बाद बहुत ही आसानी से नौकरी मिल जाती है!

होम टाउन

मेरा घर नेपाल के सीमा से सटे बिहार प्रान्त के प्रकृति की
गोद मे बसे एक छोटे और बहुत ही शांत कसबे मे है! इस कसबे
के ठीक बगल मे एक छिटी सी नदी बहती है! कसबे के सारे
बच्चे इस नदी मे नहाते है! हमारे कसबे मे एक अस्पताल,
राजकीय स्कूल, कॉलेज, आदि है! दूर तक चाय के खेत फ़ैले
हुए है जो कि प्राकृतिक को विहंगम बनाता है! हमारे कसबे
के अधिकतर लोग डाक्टर, इन्जीनीयर और शिक्षक है! यहा पास
मे एक बहुत ही बढा बाजार है जिसमे कि सारे सामान सरलता
से उपलब्ध है! अंत मे हमारा शहर बहुत ही खूबसूरत है
और मै इसकी प्रगति मे योगदान देना चाहता हूँ!

सेन्टर

मै भाषा विघालय के जापानी भाषा केन्द्र का छात्र हूँ!
हमारे केन्द्र की स्थापना सन १९८६ मे हुई थी! हमारे केन्द्र
मे जापानी के साथ-साथ कोरियन भाषा का भी अध्य्यन होता
है! जापानी भाषा क केन्द्र मे भारतीय शिक्षको के अलावा
जापानी शिक्षक भी है! भाषा की पढाई के साथ-साथ
हम लोग जापान की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, भूगोल,
इतिहास को भी पढते है! जापानी भाषा मे चीनी लिपि
होने के कारण से बहुत ही मुश्किल भाषा बन जाती है!
लिखने के साथ-साथ हम लोग बात-चीत के लिए भी लैबोरेट्री
कक्षा मे भी पढाई करते है! साल मे एक बार जापान सरकार
के सहयोग से " बुनकासाई " नाम का प्रोग्राम होता है जिसमे
हम जापान के संस्कृति को नजदीकी से देख सकते है! जापानी
भाषा मे नौकरी के बहुत अवसर है!

मेरी रूचिया

मेरा शौक फ़ुटबॉल खेलना है! मै बचपन से ही फ़ुटबॉल
खेलना मेरा शौक रहा है! बचपन से ही जब मै प्रथम
कक्षा मे था तब से ही मै फ़ुटबॉल खेलता आ रहा हूँ!
बचपन मे कई बार चोट लगने के बावजूद मै निरंतर फ़ुट्बॉल
खेलता रहा और अतत: मेरा चयन राजकीय स्तर पर हुआ!
फ़ुट्बॉल के अलावा मुझे सिनेमा मे भी शौक है! मै अक्सर नई
सिनेमा देखने जाता हूँ! नायक मे मुझे एरफ़ान खान, नाना
पाटेकर पसंद है! पसंदीदा सिनेमा की बात करे तो मुझे इकबाल
जैसे सिनेमा पसंद है और मै भविष्य मे भी कुछ सिनेमा बनाने
की सोच रहा हूँ!

Monday, November 24, 2008

पेट की खातिर

पेट की खातिर ज़्यादातर बिहारियों की तरह ही घर से दूर...... कामकाज जो मिला सो कर रहा हूँ... इस बीच देश और दुनिया के गोरे शहरों को घूम-फ़िर के समझने बुझने की पेंच में लगा हुआ हूँ... देश से बाहर हूँ तो वक्त थोड़ा ज्यादा बच जाता है ... कटाने दौड़ाने लगा तो... मैंने सोचा उसका भी थोड़ा कटा जाए जो हमारा कटते आए हैं... लिविंग-रूम,ड्राइंग-रूम में बैठ के बहुत लोगों को गरियाये... और गरियाते हुए सुने... अब ख़ुद कुछ दोस्तों के साथ कुछ करने की कोशिश जारी है.... पर ये है थोड़ा ही मुश्किल कम से कम गलियाने से ... :)

रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है

आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो. फिर जब तुम्हे खबर देंगे तो वहाँ जाकर ज्वायन कर लेना . पर धीरे - धीरेलोगो को पता लग गया कि फलाँ फार्म भरकर ढिकाँ जगह जमा कर देने भर से कुछ होना जाना नही है तो लोगो ने उस मन्दिर की राह जाकर सिर पटकना बन्द कर दिया.

बड़े बूढे कहते हैं पहले रोजगारदफ्तर वाले गली - गलीघूमते थेऔर ढूँढते रहते थे कि किसे रोजगार दिया जाये ? कोई जरा सा योग्य मानुस दिखा नहीं कि उसे पकड़ कर बिठा देते थे कि भैयायहाँनौकरी करनी पड़ेगीऔर आदमी मजबूरी मे काम करने लगता था. पर अब वो दिन हवा हुए और नौकरी देने वाले पकड़ पकड़ करलोगों को स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मना रहे हैं. और जो नहीं मान रहे उन्हें धक्के देकर बाहर कर रहे हैं. जो लोग कम्प्यूटर बाबा की लाठी टेकते हुए जर्मनी और अमेरीका एक्स्पोर्ट हो गये थे , वे भी वापस आकर देश मे चौथाई तनखाह पर रोजगार तलाश रहे हैं

देश के प्रधान मंत्री ने किसी दिन एक फाइव स्टार रिसोर्ट मे बैढकर चिंतन कियातो बेरोजगारी की हालतदेखकरवे द्रवित हो गये .जी मे तो आया कि फटाफ़ट पूर्व प्रधान मंत्रियों की तर्ज पर दो - चार कवितायें लिख डालें . पर कुछ सोच कर रह गये और सीधे यही घोषणाकर दी कि सरकार एक करोड़ लोगो को रोजगार देगी. बाद मे लोगो ने पूछा कि सरकार के उस वायदे का क्या हुआ? इस बात पर सरकार भन्ना गई. उसका भन्नाना भे स्वाभाविक है. अब अकेली सरकार क्या क्या करे बेचारी.

वह नदियों को आपस मे जोडे या लोगों को. वह समन्दर के अन्दर सेतु की रक्षा करे या अपनी. वह बैंकों की ब्याज दर घटाने मे समय लगाये या बेरोजगारी घटाये. वह अयोध्या मे मन्दिरबनाये. ये आपके भुक्खड पेट की आग बुझाये. वह करोड पति क्रिकेट खिलाडियों को टैक्स मे रियायत दे या पिद्दी जनता की कोटरो मे धंसी आँखे निहारे. अब समस्याओं पर समस्यायेंहै . पाकिस्तान है . कश्मीर है. बाँगला देशी है. नये राज्यो की डिमांड है.परमाणु समझौते हैं.

गजब के हो तुम भी. यहाँ हम कितनी बड़ी बड़ी समस्याओं से पंजा लडा रहे हैं और तुम हो कि आ गये कमीज ऊपर उठाये अपना पिचका पेट दिखाने. हम यहाँराज्यों की सरकारें गिराने - बनाने मे लगे हुए है और तुम आ गये मुँह उठाये कि खाना चाहिए.

वहाँ हम कुर्सी के इतनी बडी लड़ाई लड़ रहे हैं और एक तुमहो कि जिन्दगीकी जंग से ही नही निकल पा रहे हो.. लानत है तुम पर.वर्ल्ड वार के बजायघर वार की चिंता मे डूबउतरा रहे हो. तुम क्या अकेले हो,जो बेरोजगार हो? चीन अमेरीका , जापान कहाँनहीं है बेरोजगारी? लन्दन तक की हर दूसरी दुकान किरायेदार के लिए खाली पडी है मुँह बाये हुए.

अरे काम नही है तो काम ढूँढो. सरकार अगर लोगों को काम देने लगी तो खुद क्या काम करेगी? अरे जो वीर पुरूष हैं, उन्हे क्या काम की कमी है? लाख बेरोजगारी है पर करने वालों को काम की कमी है क्या?. आँखखोल कर देखो , पढे लिखे होने का इतना तो उपयोग करो. अनपढ किसानों तक को देखो, कुछ न कुछ करते ही रहते है. कपास गन्ना बोते है और उससे फुर्सतमिलती है तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के चक्कर लगातेहैं. इन सबसे समय़ मिलता है तो सल्फास वगैरह का स्वाद चखते है और आत्म हत्या भी करते रहते हैं.

जिनके दिल मे हिम्मत होती है, वे मन्दी का रोना नही रोते. अकल वाले कैसे भी पैसाबना लेते हैं. मुफत मे मिली किडनी भी हजारों मे सेल करते है. इसलिए बेरोजगारी का रोना मत रो प्यारे क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है. इसीलिए जोर से लगे रहो.

महानगर में दर्द

जब जब मैं उदास हुआ
वो भी हुआ
उसने अपनी लहरें खोल दी
समेटने के लिये
मेरी बेचैनियों और उदासियों को.

जब मैं रोना चाहता था
पर आँसू नही होते थे
तो उसने आंखो को आंसू दिये
और घंटों तक अपने कंधे का किनारा दिया.

हमने देखा है
और वो समेटता रहता है
अपनी लहरें फैला फैला कर
लोग किनारे की रेत पे जो अपने दर्द छोड़ देते हैं .

कभी सोंचता हूँ तो लगता है
समुद्र अक्सर महानगरों के पास होते हीं इसलिए हैं क्योंकि
महानगर में दर्द फाज़ील होते है
और उन्हें समेटने के लिये बाहें कम

शिक्षा और एडुकेशन

हमेशा ये हल्ला होता रहता है की शिक्षा का अधिकार हो, शिक्षा शक्ति है इत्यादि इत्यादि। पर, उसकी धारा में टीवी पर आये नेता - राजनितिक ही नहीं सामाजिक भी जता जाते हैं कि "education is a privilege"। वो मुखिया हैं समाज के तो सही ही जता जाते हैं। अब देखिए, देश के किसी कोने में एक सरकारी स्कूल में जाना तो अधिकार है... और शक्ति भी क्यूंकि दिन में खाना तो मिल जता है... सडी गली सब्जी वाली खिचडी ही सही। पर उस शिक्षा का ही अधिकार हमें दिया है समाज के मुखिया ने, एडुकेशन का नही। एडुकेशन तो मिलती है अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में जहाँ से जाने के बाद आदमी "काबिल" बन सके ... नौकरी चाकरी मिल सके... मेरे हिसाब से जो पढाई आज रोटी देती है वो शिक्षा है, जो कल दे वो एडुकेशन।



हमेशा यह सवाल हमलोग एक दुसरे से नहीं पूछ पाते हैं कि उंगली तो दिखा दिए पर भाई तुम क्या किये? जबाब तो मेरे पास नही है... पर करना क्या होगा? सारी तरह की गरीबी - जैसे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक में सबसे असरदार शैक्षणिक गरीबी है॥ आदमी को पंगु बना देती है अपने अधिकारों के बारे में, रोटी के बारें में, सामाजिक गरीबी को थोड़े दिनों में खुद से बुला लाती है। शायद समाज के सम्पन्न वर्ग का फायदा है। कोई तो मिलेगा गाली सुनके घर की साफ सफ़ाई करे। पर भाई, कुछ तो करना होगा.... कम से कम जब भी छुट्टियों में घर जाएँ एक बार अगल बगल वाले सरकारी स्कूल में जाये तो शायद मालुम पड़ जाएगा की क्या करना है। शायद शिक्षा का एडुकेशनीकरण हो जाये।

सचिन तेंदुलकर

पूरा नाम सचिन रमेश तेंदुलकर
जन्म 24 अप्रैल 1973
बल्लेबाज़ी का तरीक़ा दांया हाँथ बल्ला
गेंदबाज़ी का तरीक़ा दांया हाँथ लेग फ़िरकी
दांया हाँथ ऑफ़ फ़िरकी
दांया हाँथ धीमी-मध्य
टेस्ट क्रिकेट एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट
मुक़ाबले 154 417
बनाये गये रन 12273 16,361
बल्लेबाज़ी औसत 54.30 44.33
100/50 40/51 42/89
सर्वोच्च स्कोर 248* 186*
फेंकी गई गेंदें 3880 8009
विकेट 42 154
गेंदबाज़ी औसत 53.02 44.12
पारी में 5 विकेट 0 2
मुक़ाबले में 10 विकेट 0 नहीं है
सर्वोच्च गेंदबाज़ी 3/10 5/32
कैच/स्टम्पिंग 100/0 122/0


सचिन रमेश तेंदुलकर सहायता·सूचना (जन्म: 24 अप्रैल १९७३ मुम्बई में) भारत के एक क्रिकेट खिलाड़ी हैं। सचिन क्रिकेट के इतिहास में विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में गिने जाते हैं।[१][२][३] उन्होंने अपने खेल की शुरुआत १९८९ मे की थी।

वे बल्लेबाजी में कई कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। उन्होंने टेस्ट व एक दिवसीय क्रिकेट, दोनों मे सर्वाधिक शतक अर्जित किये हैं। वे टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ है। इसके साथ टेस्ट क्रिकेट में १२००० से अधिक रन बनाने वाले वे विश्व के एकमात्र खिलाड़ी हैं [४]। एकदिवसीय मैचों मे भी उनहे कुल सर्वाधिक रन बनाने का कीर्तिमान प्राप्त है। उनका अपना पहला प्रथम श्रेणीय क्रिकेट मैच मुंबई के लिये १४ वर्ष की उम्र मे खेला। उनके अंतरराष्ट्रीय खेल जीवन की शुरुआत १९८९ मे पाकिस्तान के खिलाफ कराची से हुई।

सचिन राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित एकमात्र क्रिकेट खिलाड़ी हैं। वे सन् २००८ मे पद्म विभूषण से भी पुरस्कृत किये जा चुके है। वे क्रिकेट जगत के सर्वाधिक प्रायोजित खिलाड़ी हैं और विश्वभर मे उनके अनेक प्रशंसक हैं। उनके प्रशंसक उन्हें प्यार से लिटिल मास्टर व मास्टर ब्लास्टर कह कर बुलाते हैं। क्रिकेट के अलावा वे अपने ही नाम के एक सफल रेस्टोरेंट के मालिक भी हैं।

व्यक्तिगत जीवन

राजापुर के सारस्वत ब्राह्मण परिवार मे जन्मे सचिन का नाम उनके पिता रमेश तेंडुलकर ने उनके चहेते संगीतकार सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा था। उनके बड़े भाई अजीत तेंडुलकर ने उन्हें खेलने के लिये प्रोत्साहित किया था। सचिन के एक भाई नितिन तेंडुलकर और एक बहन सवितई तेंडुलकर भी हैं। 1995 मे सचिन तेंडुलकर का विवाह अंजलि तेंडुलकर से हुआ। सचिन के दो बच्चे हैं सारा व अर्जुन।

सचिन ने शारदाश्रम विद्यामंदिर मे अपनी शिक्षा ग्रहण की। वही पर उन्होंने प्रशिक्षक (कोच) रमाकांत अचरेकर के सान्निध्य मे अपने क्रिकेट जीवन का आगाज किया। तेज गेंदबाज बनने के लिये उन्होने एम०आर०एफ० पेस फाउंडेशन के अभ्यास कार्यक्रम मे शिरकत की। पर वहां तेज गेंदबाजी के कोच डेनिस लिली ने उन्हे पूर्ण रूप से अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान केंद्रित करने को कहा।

युवाकाल मे तेंडुलकर घंटों अपने कोच के साथ अभ्यास करते थे। उनके कोच स्टम्प्स पर एक रुपये का सिक्का रख देते, और जो गेंदबाज सचिन को आउट करता, वह् सिक्का उसी को मिलता था। और यदि सचिन बिना आउट हुये पूरे समय बल्लेबाजी करने मे सफल हो जाते, तो ये सिक्का उन्हें मिलता था। सचिन के अनुसार उस समय उनके द्वारा जीते गये 13 सिक्के आज भी उन्हे सबसे ज्यादा प्रिय हैं।

1988 मे स्कूल के एक हॅरिस शील्ड मॅच के दौरान साथी बल्लेबाज विनोद कांबली के साथ सचिन ने ऐतिहासिक 664 रनो की अविजित साझेदारी की। इस धमाकेदार जोडी के अद्वितीय प्रदर्शन के कारण एक गेंदबाज तो रो ही दिया और विरोधी पक्ष ने मैच आगे खेलने से इंकार कर दिया। सचिन ने इस मैच मे 320 रन और प्रतियोगिता मे हजार से भी ज्यादा रन बनाये।

सचिन प्रति वर्ष 200 बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी ‘अपनालय’, एक गैर सरकारी संगठन, से लेते हैं।

खेल पद्धति

सचिन तेंडुलकर उभयहस्त हैं। वे गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ी दायें हाथ से करते हैं किंतु लिखते दायें हाथ से हैं। वे नियमित तौर पर बायें हाथ से गेंद फेंकने का अभ्यास करते हैं। उनकी बल्लेबाज़ी उनके बेहतरीन संतुलन व नियंत्रण पर आधारित है। वे भारत की धीमी पिचों की बजाय वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया की सख्त व तेज़ पिच पर खेलना ज्यादा पसंद करते हैं [५]। वे अपनी बल्लेबाजी की अनूठी पंच शैली के लिये भी जाने जाते हैं।


ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रशिक्षक जॉन ब्यूकैनन का मानना है कि तेंडुलकर अपनी पारी की शुरुआत में शार्ट गेंद के ग्रहणशील हैं। उनका मानना यह भी है कि बाई हाथ की तेज गेंद तेंडुलकर की कमज़ोरी है [६] । अपने करियर के शुरुआत मे सचिन की खेल शैली आक्रमणकारी हुआ करती थी। सन् २००४ से वे कई बार चोटग्रस्त रहे हैं। इस वजह से उनकी बल्लेबाजी की आक्रामकता में थोड़ी कमी आई है। पूर्व ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ईयन चैपल का मानना है कि तेंडुलकर अब पहले जैसे खिलाड़ी नहीं रहे। किन्तु २००८ में भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर तेंडुलकर ने कई बार अपनी आक्रामक बल्लेबाज़ी का परिचय दिया।

तेंडुलकर नियमित गेंदबा़ज़ नहीं हैं। किन्तु वे मध्यम तेज, लेग स्पिन व ऑफ स्पिन गेंदबाज़ी में प्रखर हैं। वे कई बार लम्बी देर से टिकी हुई बल्लेबाजों की जोडी को तोड़ने के लिये गेंदबाज़ के रूप में लाए जाते हैं। भारत की जीत पक्की कराने में अनेक बार उनकी गेंदबाज़ी का प्रमुख योगदान रहा है[७]।
कीर्तिमान् स्थापित

* एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले में सबसे ज्यादा रन (१६००० से अधिक)
* एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले में सबसे ज्यादा शतक
* एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय के विश्व कप मुक़ाबलों में सबसे ज्यादा रन
* टेस्ट क्रिकेट मे सबसे ज्यादा शतक (३९)[८]
* रिकार्डो के बादशाह सचिन तेंडुलकर श्रीलंका के खिलाफ मंगलवार को अपनी 35 रन की पारी के दौरान एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 16 हजार रन पूरे करने वाले पहले बल्लेबाज बने।
* टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रनों का कीर्तिमान| [९]
* टेस्ट क्रिकेट १२००० रन बनने वाले विश्व के पहले बल्लेबाज |


फरवरी 05, मंगलवार, मास्टर ब्लास्टर तेंदुलकर को इसके लिए केवल 28 रन की दरकार थी। अपना 409वां मैच खेल रहे तेंदुलकर ने अब तक 399 पारियों में 44.21 की औसत से 16007 रन बनाए हैं जिसमें 41 शतक और 87 अर्धशतक शामिल हैं। तेंदुलकर के बाद एक दिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक रन श्रीलंका के सनथ जयसूर्या ने बनाए हैं जिनके नाम पर इस मैच से पहले तक 12207 रन दर्ज थे। जयसूर्या का यह 404वां मैच है। अब तक 400 से अधिक एकदिवसीय मैच केवल इन्हीं दो खिलाडि़यों ने खेले हैं।

तेंदुलकर 146 टेस्ट मैचों में भी अब तक 11782 रन बना चुके हैं और इस तरह से उनके नाम पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 27789 रन और 80 शतक दर्ज हैं। तेंदुलकर ने अपने एक दिवसीय करियर में सर्वाधिक रन आस्ट्रेलिया के खिलाफ बनाए हैं। उन्होंने विश्व चैंपियन के खिलाफ 55 मैच में 44.92 की औसत से 2471 रन ठोके हैं जिसमें सात शतक और 13 अर्धशतक शामिल हैं। श्रीलंका के खिलाफ भी उन्होंने सात शतक और 14 अर्धशतक की मदद से 2471 रन बनाए हैं लेकिन इसके लिए उन्होंने 66 मैच खेले हैं।

इस स्टार बल्लेबाज ने पाकिस्तान के खिलाफ 66 मैच में 2381 रन बनाए हैं। इसके अलावा उन्होंने दक्षिण अफ्रीका [1655], वेस्टइंडीज [1571], न्यूजीलैंड [1460], जिम्बाब्वे [1377] और इंग्लैंड [1274] के खिलाफ भी एक हजार से अधिक रन बनाए हैं। तेंडुलकर ने घरेलू सरजमीं पर 142 मैच में 46.12 की औसत से 5766 और विदेशी सरजमीं पर 127 मैच में 35.48 की औसत से 4187 रन बनाए हैं लेकिन वह सबसे अधिक सफल तटस्थ स्थानों पर रहे हैं जहां उन्होंने 140 मैच में 6054 रन बनाए हैं और उनका औसत 50.87 है। वह भारत के अलावा इंग्लैंड [1051], दक्षिण अफ्रीका [1414], श्रीलंका [1302] और संयुक्त अरब अमीरात [1778] की धरती पर भी एक दिवसीय मैचों में एक हजार रन बना चुके हैं।

पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन ने तेंडुलकर को सलामी बल्लेबाज के तौर पर भेजने की शुरुआत की थी जिसमें मुंबई का यह बल्लेबाज खासा सफल रहा। ओपनर के तौर पर उन्होंने 12891 रन बनाए हैं। जहां तक कप्तानों का सवाल है तो तेंडुलकर सबसे अधिक सफल अजहर की कप्तानी में ही रहे। उन्होंने अजहर के कप्तान रहते हुए 160 मैच में 6270 रन बनाए जबकि गांगुली की कप्तानी में 101 मैच में 4490 रन ठोंके। हालांकि स्वयं की कप्तानी में वह अधिक सफल नहीं रहे और 73 मैच में 37.75 की औसत से 2454 रन ही बना पाए।

तारे ज़मीन पर - क्या नया, क्या पुराना?

आमिर खान निर्देशित फ़िल्म "तारे ज़मीन पर" हालिया प्रदर्शित हुई है और इंटरनेट पर इसको प्रवर्तक फ़िल्म करार देने कि होड़ मची है. इस फ़िल्म में कुछ चीज़ें बड़ी आसानी से कह दी गई है, पर कुछ मार्ग दर्शक बनने में इस फ़िल्म में कुछ कमियां है. पर, इस फ़िल्म को संवेदनशील जरूर कहा जा सकता है. इस फ़िल्म जो चीज़ें बखूबी कही गई है वो हैं -
१) समाज में सफलता की घुड़दौड़.
२) माँ-बाप के आकाँक्षाओं का शिकार होता बचपन
३) शैक्षिक परिवेश की खामिया - तिवारी सर को रटारटाया जबाब चाहिए, आर्ट टीचर का चालक फ़ेंक के मारना, सृजनात्मकता का कोई जगह नहीं होना.
४) दंड आधारित अनुशाषण सोच.
५) मध्यम वर्गीय परिवार की सफलता की भूख
६) हर बच्चे की अलग अलग जरूरत होती है और उसको थोड़े ध्यान और ज्ञान से मुख्यधारा में जोडा जा सकता है - ईशान राम निकुम्भ सर से अपने को इसलिए जोड़ पता है उनको अपने जैसा पाता है. पर शायद ही अपने को आइंस्टाइन और दा विन्ची से जोड़ पाता है.

जो बातें नहीं मुझे खटकी. उनमें से एक है - ईशान और राम निकुम्भ सर लड़ रहे हैं इस घुड़दौड़ की मानसिकता से. अगर ये कहें की ईशान राम निकुम्भ सर के मेहनत के बाद भी किस तरह पडी लिखी कर के बस पास भर कर पाता पर सबसे अच्छा पेंटर नहीं बन पाता तो क्या? यहाँ पर यह फ़िल्म बस एक बॉलीवुड फ़िल्म हो जाती है कि नायक हमेशा अव्वल करता है. और इस फ़िल्म भी, ईशान और राम निकुम्भ सर उसी घुड़दौड़ में शामिल हो जाते हैं जिससे वो लड़ने निकलते हैं.

बोर्डिंग स्कूल एक डरावनी जगह है - बच्चों को दंड देने के लिए वहाँ भेजा जाता है. यह बात बहुत पची नहीं. मेरे हिसाब से इस फ़िल्म में कथानक के हिसाब से मध्यम वर्गीय परिवार पेट काट के अच्छी शिक्षा के लिए बोर्डिंग स्कूल भेजता है. शैक्षिक परिवेश में एक भी अच्छी बात नहीं दिखाई गई है. पर वहीं राजन दामोदरन को लंगडा होते हुए भी स्कूल में दिखाया गया है.

एक और बात बहुत नहीं जमी - आत्मविश्वास का सफलता से जोडा जाना. अपने स्कूल और कॉलेज के सालों में हमें देखा कि बहुत से ऐसे बच्चे जो सफल होते हैं - सामाजिक मापदंड से - स्कूल के रिजल्ट में उनमें से कई आत्मसंशय कि स्तिथि में रह जाते हैं. मेरे हिसाब से सफलता एक आपेक्षिक शब्द है और उसका विश्वास से कोई लेना देना नहीं है.

ज्यादातर मध्यमवर्गीय माँ-बाप अपने बच्चों को बड़ा करते समय बहुत सारी चीज़ें सिखाते हैं. जरूरी नहीं है उन्हें सारी चीजों का ज्ञान हो और बच्चों की सारी समस्यायों का निराकरण कर सकें. बाप को कम से कम इस फ़िल्म में विल्लन ही दिखाया गया पर एक बिन्दु रेखांकित करने योग्य है की बाप अपने बच्चों के लिए जो भी बन पाता है वो करने की कोशिश करता है. बस थोड़ा सा सो कॉल्ड - जेनरेशन गैप है. :) कभी कभी तो ऐसा लगने लगता है ... यह फ़िल्म अनुशासन और मेहनत के विरोध में है. बच्चा जो करता है करने दो की तर्ज़ में. “तितली से मिलने जाते हैं पेडों से बातें करते हैं”

यह फ़िल्म हम जैसे लोगों की तरह बस सवाल उठा के छोड़ जाता है... उसका जबाब कैसे खोजे वह नहीं कर पाता है. बच्चे को Dyslexia पर दूर कैसे करें मालूम नहीं. इस फ़िल्म को "स्वदेस" की कड़ी में इस लिए नहीं रख पा रहा हूँ... की उसमें समस्याएं भी हैं और निदान भी

बाढ, मिडिया और उसकी उदासीनता

हम कन्फ्यूज्ड हैं कि जो देखे पढें वो गलत था या जैसा बाकी कहते हैं कि बुध्दिजीवी की तरह चिरंतन रूदन सुना रहे हैं -- जब कन्फ्यूज्ड ही हैं तो कह दें। चलो कम से कम कैसे भी कैसे भी करके हम बुध्दिजीवी हो लिए।भूमिका में बिना पडे बस अपनी बात कह देने की कोशिश कर रहा - पिछले साल की बात है - मुम्बई में बाढ आयी थी, फिर आयी गुजरात और राजस्थान में, इस बीच हर साल की तरह असाम और बिहार में। मुम्बई की २४ घंटे की बाढ को सब ने टीवी पर देखा, अखबारों में पढा। पर् उत्तरी भारत में आयी बाढ का जिक्र भर आया खबरों में। पर इस साल कई जगह बाढ आयी - इग्लैंड, बिहार, असाम बंग्लादेश, जर्मनी और पूर्वी यूरोपीये देशों में। इन सब का भी हर बार की तरह इस बार भी जिक्र ही आया। उत्तरी भारत में आयी बाढ का जिक्र भी शायद इसलिए आया की दिल्ली के पत्रकारों को राजमाता गांधी की हवाई जहाज में लिफ्ट मिल गई। कुछ बाईट का जुगाड हुआ और राजमाता के साथ भी हो लिए। शायद उत्तरी भारत की बाढ का असर हमारे मिडिया के हिसाब से किसी पर अच्छा या बूरा नहीं पड्ता।

क्या फर्क पड्ता हैं, बिहार या असाम में आयी बाढ से - न सेन्सेक्स गिरता हैं, न बम फूटता है - न ही कोई मसाला हैं। पहले कहीं सुना था, बाद में पढा भी कि मिडिया का लोकतंत्र में क्या स्थान है। पर जब भी कभी खोजा तो पाया कि जो लोग हमारे यहाँ से मिडिया में गये और जो संसद में गये वो परिस्कृत हो गये। जैसे जैसे उनका कद उंचा और आवाज़ बुलंद होती गयी, सरोकार कम से कमतर होता गया। और मिडिया आवाज़ न हो के मनोरंजन बन के रह गया है।
हमारे पत्राकार (विशेषकर टीवी वाले) पूछते हैं - उनके पास मॉडल क्या है? राखी सावंत, जह्नवी कपूर सरीखे न्यूज के मॉडल क्या है? इनके के लिये तो मॉडल आपने कहाँ से तलाशे अगर आप्को मॉडल चाहिये तो मॉडल है - बीबीसी, डीडब्लू टीवी जैसे अंतरराष्टीय न्यूज चैनल। जो मनोंरजन भी परोसते, सनसनी भी और समवेदना भी ... बस आपको कुछ सीखना है या नहीं। और, सीखना हैं तो क्या?

बहुभाषीय फ़िल्म

ग्यारह अंतर्राष्ट्रीय फिल्मकारों को Alain Brigand (फ्रांसीसी प्रोड्यूसर) ने ११ सितम्बर २००१ के आतंकवादी हमले पर फ़िल्म बनाने के लिए कहा। इस फ़िल्म में सारी कलात्मक स्वतंत्रा दी गई सिवाय इसके कि हर फिल्म 11 मिनट ९ सेकंड और एक फ्रेम की होगी। यह फिल्मों का गुलदस्ता कुछ अनछुई भौगोलिक, सांस्कृतिक और कलात्मक परिपेक्ष्य ले के आता है सितम्बर ११ के घटना को ले कर। हर फ़िल्म अपने आप में एक प्रतिसाद है - राजनितिक, वैश्लेषिक या कलात्मक। 11'09”01 शायद बुरी तरह से पिट जाती है इस घटना को saapekhon को या उसके बाद के परिदृश्यों को उजाघर करने में। पर, कम से कम एक संवाद बनाने की कोशिश की गई. कुछ ११ नामी गिरामी फिल्मकारों ने पश्चिमी मीडिया के आक्रामकता को चुनौती दी है और थोड़ा भोथा जरूर किया है. फिल्में क्वालिटी और विषयवस्तु में बहुत भिन्न हैं. दो फिल्में अमेरिका के अन्य आतंकी सहभागिता का हवाला देती हैं. दो फिल्मों में दो और पुरानी ऐसी ही घटना की चर्चा है.
1) इरान - समीर मख्माल्बफ़ की इरानी सेगमेंट में एक शिक्षिका इरान के एक रिफ्यूजी कैंप में बच्चों का स्कूल चलाती है. वहाँ के वयस्क इस घटना के बाद अमेरिकी हमले की आशंका में है पर बच्चे इन सब से दूर अपने सरलता में मग्न हैं. शिक्षिका दो मिनट का मौन करवाती है इस घटना को लेकर पर बच्चे अपने को is घटना से आत्मसात नहीं कर पाते हैं. उनकी दुनिया बस उसी कैंप के दुखदायक घटना पर है. शिक्षिका बच्चों को ईट्ट भट्ठा की चिमनी को उपर दिखाती है. और बच्चों को समझती है की टॉवर क्या है और उसका गिरना क्या है?
एक शब्द - फ्रेश.

2) फ्रेंच - Claude Lelouch की फ्रेंच सेगमेंट मुझे सबसे बेवकूफी पूर्ण और अगंभीर लगी। इस फ़िल्म ने इस घटना के चारों तरफ़ एक रोमांटिक गल्प खड़ा करके, इस त्रासदी और फ़िल्म के अन्य राजनितिक निष्कर्ष कम करने की कोशिश की है. फ़िर भी, यह एक कहानी है - मूक फ्रांसीसी लड़की और उसके अमेरिकी बॉयफ्रेंड के बीच की प्यार-तकरार की. इस घटना को पृष्ठभूमि में लेकर. पर इस फ़िल्म में टीवी के रोल को रेखांकित करने की कोशिश जरूर दिखी है.
एक शब्द - बेकार

3) Egypt (मिश्र) - Yousseff Chahine की इस सेगमेंट में एक फ़िल्म डायरेक्टर बिना किसी जरूरी अनुमति के WTC टॉवर के पास से पुलिस द्वारा भगा दिया जाता है। अगले दिन मीडिया के सवालों से कैसे दूर रखता है। फ़िर इतिहास के उन पन्नों को खंघाने की कोशिश होती है की क्यों बेरुत में ४०० अमेरिकी पर हमला कर १९८५ में को मारा गया. यह फ़िल्म के तरफ़ अमेरिकी आतंक और दूसरी तरफ़ दुनिया में उसके प्रतिरोध को दिखाती है.
एक शब्द - महत्वाकांक्षी

4) बोस्निया - Danis Tanovic की यह सेगमेंट संवाद के लिहाज से सबसे आगे है। यह कहानी सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर करती है. यह कहानी का आधार है -१९९५ में बोस्निया में हुए सर्ब हमलों में मुस्लिमों पर हुए अत्याचार है. एक तीस साल रेडियो पर खबरें सुन कर अपने छोटे गाँव के मुख्य चौक की तरफ़ जाती है. वह के अपांग पुरूष से मिलती है जो शायद गाँव का अकेला मर्द है. वह कहता है - आज ज्यादा महिलाएं नही आएगी उसकी मासिक यादगार सभा में. क्यूंकि हर कोई समाचार सुनने में लगा हुआ होगा. हर महीने के ११ तारीख को इस गाँव की महिला ११-जुलाई-१९९५ को हुए घटना की याद में मानती हैं. वो कहती है की टीवी न्यूज़ वाले इस घटना के बाद उसकी सम्वेंदा समझने आयेंगे. वह ग़लत है, कोई टीवी वाला नही आता है पर वो महिलाएं अपना मार्च करतीं हैं.
एक शब्द - तीक्ष्ण

5) बुर्किना-फासो - Idrissa Ouedrago की यह सेगमेंट को अगर सबसे मीठा कहें तो कुछ ग़लत नही है। इस कहानी में वयस्कों की कोई जगह नही है। एक गरीब लड़का एक पुराने छोटे से बाज़ार में रेडियो पर समाचार सुनता है कि २५ मिलियन डॉलर का इनाम मिलेगा जो ओसमा बिन लादेन को पकड़वाने के लिए सूचना देगा. उसकी माँ बीमार है और उसके इलाज के लिए पैसा चाहिए. यह लड़का एक अबर मुस्लिम को बाज़ार में देखता है जो ओसामा जैसा दिखता है. वह और उसके और स्कूली साथी उस ओसामा की विडियो फ़िल्म बनाने में लग जाते हैं ताकि उसको पकड़वाया जा सके और इनाम की रकम से माँ के इलाज के साथ कुछ अच्छे कार्य किए जा सके. ये लड़के ओसामा का पीछा करते हुए एअरपोर्ट तक आ जाते हैं जहाँ ओसामा flight पकड़ रहा होता है. पुलिस वाले को वह सबूत दिखाने की कोशिश करते हैं ... पर...
एक शब्द - मीठा-खट्टा

6) ब्रिटेन - Ken Loach के इस सेगमेंट में एक और ११ सितम्बर को जिलाने की कोशिश की गई है। यह है १९७३ का ११ सितम्बर। उस दिन, General Augusto Pinochet (चिली के तानाशाह), सीआईए की मदद से चिली की सत्ता हथिया लेता है. और उसकी सत्ता में दो दशको तक खूनी खेल खेला जाता है जिसका मकशाद है - समाजवादी और लोकतांत्रिक लोगों का खात्मा. इस फ़िल्म में B&W/कलर में बखूबी documentry की शक्ल में एक Vladimir Vega के अनुभवों को दोस्तों को लिखे जा रहे है पत्र में पेश किया गया है. Vladimir Vega अभी भी देश से बाहर रह रहा है उस समय की घटनाओ से आज तक आहत है. काफी हद तक इसको एक पॉलिटिकल फ़िल्म कह सकते हैं.
एक शब्द - भिन्न

7) मेक्सिको - Alejandro Gonzalez Inarrito की यह सेगमेंट सबसे गूढ़ है। यह फ़िल्म सबसे ज्यादा क्रिएटिव है. इस फ़िल्म में मूलत: साउंड इम्प्रेशन और हाईजैक विमान से हुए फ़ोन से काले स्क्रीन पर आ जाती है. अंत के समय स्क्रीन थोड़ा खुलता है और WTC टॉवर से गिरते लोग और गिरती इमारत दिखाती है. अंत में अरबी में एक सवाल आता है - "Does God's Light blind us or guide us?" (आध्यात्म/ धर्म की रौशनी हमे आगे बढाती है या अँधा बनती है?).साउंड इम्प्रेशन और मिक्सिंग बिना कहानी के भी और विसुअल के भी बहुत कुछ कह जाती है.
एक शब्द - क्रिएटिव

8) इसराइल - Amos Gitai के इस सेगमेंट में तेल अवीव के एक आम दिन एक टीवी रिपोर्टर की बीट पर एक धमाका होता है। यह एक अनंक्वादी हमला है. यह इस रिपोर्टर के लिए एक बहुत अच्छा मौका है अपने को दिखाने का. वह सरे लोगों को और भीड़ में धक्का मुक्की करके घटना को टीवी के लिए कवर करने की कोशिश करती है. पर, उसी समय WTC की घटना हो जाती है. यह फ़िल्म कभी तो स्वाधीन लगती है और बेतुकी लगती है. समझ में नहीं आता है की इसराइल की समस्या बड़ी है या क्या दिखाने की कोशिश की है. फ़िर कुछ सोचने पर लगता है कि यह एक बढिया Satire है. एक दुखद घटना का भी टीवी रिपोर्टर के एक स्टोरी से ज्यादा कुछ नही है. हम अपने से आगे कुछ सोच नही पाते है.
एक शब्द - satire

9) भारत -- Mira Nair की यह सेगमेंट एक सच्ची कहानी पर आधारित है। एक मुस्लिम पाकिस्तानी माँ का बेटा अपने काम पर जाते समय गायब हो जाता है. और वह दिन है ११ सितम्बर २००१. जगह - न्यू यार्क का मिडिल क्लास इलाका. पहले तो पडोसियों से सहानभूति मिलती है. बाद में FBI आकर परिवार वालों से पूछ ताछ करती है और मिडिया उसको आतंकवादी घोषित कर देता है. बाद में मालूम चलता है - उस लड़के ने WTC टॉवर से लोगों को निकलने में अपनी जान गँवा दी. यह फ़िल्म कोई भी एक्सपेरिमेंट नही है... कहानी भी काफी जानी पहचानी है. इससे लोकल aftermath की एक कहानी की तरह देखा जा सकता है.
एक शब्द - श्रधांजलि

10) अमेरिका -- Sean Penn की यह सेगमेंट सबसे आउट-ऑफ़-टच लगी। पर इससे एक fallacy के रिलेशन में भी देखा जा सकता है। एक बुड्डा अकेला आदमी WTC की परछाई में अपने फ्लैट में रह रहा होता है. वह आदमी अब भी यही सोचता है की उसकी बीवी उसके साथ है. और उससे बेद पर बतियाता रहता है अपने अंधेरे से कमरे और बेड पर. टॉवर का गिरना उसके घर को रौशन करता है और सच्चाई में लता है.
एक शब्द - निराशाजनक

11) जापान - Shohei Imamura की इस सेगमेंट में त्रासदी का एक और रंग दिखाया गया है। एक बारगी लगता है इसका क्या रिश्ता है ११ सितम्बर से. १९४५ में एक जापानी सैनिक एक बाड़े में बंद कर के रखा गया है. युद्ध में वुर मानसिक रूप से बीमार हो जाता है और ख़ुद को सांप समझने लगता है. यहाँ तक की बना बनाया खाना खाने के बदले चूहा पकड़ के खाने लगता है. गाँव के मुर्गे मुर्गियों को खाने लगता है. गाँव के लोग उसको और परिवार को अपमानित करते हैं. एक दिन वह गायब हो जाता है. और उसकी बीवी गायब होते हुए देखती रह जाती है. अंत में स्क्रीन पर आता है - "There is no such thing as a Holy War." (धर्मयुद्ध कुछ नहीं होता है)